छात्रो के स्वास्थय के विकास में शिक्षा की भूमिका

Students Counseling
SAR Report

”स्वस्थ शरीर मे स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है“। अतः हम कह सकते हैं कि शारीरिक स्वस्थता बालक के मानसिक विकास में सहायक होेती है । स्वस्थ शरीर की कुछ विशेषताएॅं है , आत्म चेतना, क्रियाशीलता, शारीरिक गठन, सामाजिकता, मानसिक स्वास्थय,दृढइच्छा शक्ति, आत्म संतोष आदि । एक स्वस्थ बालक वर्तमान विश्व व समाज की प्रथम आवश्यकता है तथा समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण होता हैे अतः छात्रांे में स्वास्थय के प्रति जागरूकता उत्पन्न कर उनमें शारीरिक बलिष्ठता, स्फूर्ती व मानसिक संतुलन लाना वर्तमान शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है ।
इस हेतु शिक्षा के निम्न उद्देश्य निर्धारित किये जा सकते है –
1. उत्तम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थय हेतु स्वच्छता, व्यायाम, आराम, निद्रा, योग, आसन व भोजन
आदि से संबंधित स्वास्थयप्रद आदतांे का विकास करना ।
2. छात्रो को शारीरिक शिक्षा की आधुनिक शिक्षण विधियों से परिचित करवाकर नवीनतम खेलों की
जानकारी देना ।
3. छात्रांे में शारीरिक व मानसिक कुशलता का विकास करना ।
4. विभिन्न प्रकार के योग, आसनांे की जानकारी देना ।
5. प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी देना ।
6. पर्यावरण संरक्षण व स्वास्थय शिक्षा में सहसंबंध स्थापित करना ।
विद्यालयों में छात्रों के उत्तम स्वास्थय के विकास हेतु विभिन्न शैक्षणिक व सह शैक्षणिक गतिविधियाॅं आयोजित की जा सकती हंै । स्वास्थय के दो महत्वपूर्ण पक्ष हंै, शारीरिक स्वास्थय तथा मानसिक स्वास्थय । शारीरिक व मानसिक स्वस्थता के विकास हेतु कुछ प्रमुख सहशैक्षणिक गतिविधियाॅं निम्न हंै –
1. प्रातःकाल विद्यालयों मेे बालकांे के लिए योग व शारीरिक व्यायाम की व्यवस्था करना जिससे बालक का मानसिक व शारीरिक स्वास्थय ठीक रहेगा तथा उसकी एकाग्रचितता बढेगी व अवसाद की समस्याआंे का भी निराकरण होेगा ।
2. विद्यालयों में छात्रों के लिए विभिन्न खेलांे जैसे क्रिकेट, खो-खो, फुटबाॅंल, कबड्रडी, हसांे- दौडो, चूहा- बिल्ली आदि का आयोजन करना । खेलों के माध्यम से बालकों का व्यायाम हो जाता है जिससे वे शारीरिक रूप से ंस्वस्थ रहते हंै तथा उनकी मूल प्रवृतियांे का शोधन होने से उनका माानसिक स्वास्थय भी उत्तम रहता है ।
3. विद्यालय में समय-2 पर चिकित्सकांे को बुलाकर छात्रों की शारीरिक अंगों जैसे आॅंख, नाक, कान, दाॅंत आदि की जाॅंच करवायी जाये तथा उन्हे स्वस्थ रखने हेतु निर्देशन दिया जाए ।
4. परामर्श व निर्देशन की सेवाऐं उपलब्ध करवायी जाए जिससे छात्रों को मानसिक रूप से संतुलित होने में मदद मिले ।
5. विद्यालय में समय-2 पर बाल-मेलांे, विज्ञान क्लब, प्रदर्शनियों, वाद- विवाद व प्रतियोगिताओं का आयोजन कराने से छात्रों की रूचि व सृजनात्मकता को पोषण मिलता है तथा उनमे आत्मसंतुुष्टि की भावना पैदा होती है जो कि उनके स्वास्थय के लिए लाभप्रद है ।
सह शैक्षणिक गतिविधियों के अलावा शैक्षिणिक गतिविधियाॅं जैसे- स्वास्थय व शारीरिक शिक्षण की व्यवस्था करना जिसके अन्तर्गत छात्रों को शरीर विज्ञान, स्वच्छता का महत्व, स्वच्छ भोजन व पानी का महत्व, संतुलित भोजन, शारीरिक – मानसिक वृद्धि, अच्छे स्वास्थय मे पर्यावरण का महत्व , सामान्य बीमारियाॅं व रोकथाम, विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का शरीर पर प्रभाव आदि की जानकारी दी जा सकती है ।
हरबर्ट स्पेसर ने ”योग्यतम की अतिजीविता” का सिद्धान्त दिया था जिसके अनुसार वही प्राणी जीवित रहता है जो योग्यतम व ताकतवर होता है तथा निर्बल प्राणी परिस्थितियों के साथ समायोजन नही कर पाता तथा उसका अंत हो जाता है । अतः शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बालक ही वर्तमान समाज का योग्यतम सदस्य बनकर जीविका निर्वहन कर सकता है तथा उसे योग्यतम बनाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका सर्वविदित है ।