बचपन की कहानियां और व्यक्तित्व निर्माण

बचपन की कहानियां और व्यक्तित्व निर्माण

वर्तमान में संयुक्त परिवार बहुत कम हो गए हैं। वर्तमान में एकल परिवार का बोल – बाला है क्योंकि अच्छा रोजगार न मिल पाने के कारण बच्चे जहां अच्छी नौकरी मिलती है वहां जाकर रहने लग जाते हैं। माता – पिता अपने बच्चों को सुखी देखकर ही स्वयं खुश होते रहते हैं।

वर्तमान में इतनी महंगाई होने के कारण पति – पत्नि दोनों को काम करना आवश्यक हो गया है, ऐसी स्थिति में बच्चों की परवरिश वे स्वयं सही ढंग से नहीं कर पाते हैं और शायद इसी वजह से बच्चों को आया के पास, डे – बोर्डिंग स्कूल या क्रैच में रखना पड़ता है।

वहां बच्चों को वो संस्कार नहीं मिलते जो एक संयुक्त परिवार में दादा – दादी, चाचा – चाची, ताऊ – ताई, भुआ व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहकर मिलते हैं तथा नैतिक गुणों का विकास होता है। बाल्यावस्था में बालक को कहानियों के माध्यम से दादा – दादी जो शिक्षा देते हैं वो अमिट हो जाती है।

उन कहानियों का बालक की सोच, उसके विचार, उसकी कल्पना, उसके स्वभाव पर बहुत प्रभाव पड़ता है। निम्नलिखित कहानी के द्वारा हम इस बात को समझ सकते हैं –

राम बहुत भोला छोटा सा लड़का था। वह हमेशा रात में सोने से पहले अपनी दादी से कहानी सुनता था। उसकी दादी उसे देवताओं, राजा – रानी, परियों, रामायण, महाभारत आदि की कहानियां सुनाया करती थी, एक दिन दादी ने उसे स्वर्ग का वर्णन सुनाया।

स्वर्ग का वर्णन इतने सुंदर तरीके से सुनाया कि राम स्वर्ग को देखने की ज़िद करने लगा, दादी ने उसे बहुत समझाया कि मनुष्य स्वर्ग नहीं देख सकता परंतु ज़िद करते हुए वह रोने लगा और रोते – रोते सो गया। उसे स्वप्न में एक देवता दिखाई दिए, वे उसे कह रहे थे कि स्वर्ग देखने के लिए पैसे देने पड़ते हैं।

स्वप्न में राम सोचने लगा कि दादी से पैसे लेकर दे दूंगा। परंतु देवता ने उसे कहा कि वहां मनुष्य के रुपए कोई काम नहीं आते। वहां तो भलाई और पुण्यकर्मों से कमाया हुआ रुपया चलता है। ऐसा कहते हुए उसे एक डिबिया दी और कहा जब तुम अच्छा काम करोगे तो इसमें एक रुपया आ जाएगा और जब कोई बुरा काम करोगे तो वो एक रुपया उड़ जाएगा। जब यह डिबिया भर जाएगी, तब तुम स्वर्ग देख सकोगे।

जब राम की नींद खुली तो उसने अपने तकिए के पास सचमुच एक डिबिया देखी। उसे लेकर वह बहुत प्रसन्न हो गया। उस दिन उसकी दादी ने उसे एक रुपया दिया जिसे लेकर वह घर से बाहर निकला। एक रोगी भिखारी उससे पैसे मांगने लगा। राम उसे वह रुपया देना नहीं चाहता था किन्तु सामने से अध्यापक को आते देखा तो उसने वह रुपया निकाल कर भिखारी को दे दिया

अध्यापक दयावान बालकों की बहुत प्रशंसा करते थे, उन्होंने उसे शाबाशी दी और प्रशंसा की। राम ने घर जाकर डिबिया देखी तो वो खाली थी। रात को स्वप्न में फिर वही देवता दिखाई दिए उन्होंने कहा, ” बालक तुमने प्रशंसा पाने के लिए पैसा दिया था, सो प्रशंसा तुम्हें मिल गई।” देवता ने बताया कि यदि लाभ की आशा से अच्छा काम किया जाता है तो वह व्यापार कहलाता है, पुण्य नहीं।

दिन बीतते गए, एक दिन अपने एक बीमार दोस्त से मिलने के लिए उसके घर जाते वक़्त राम ने रास्ते में अपने लिए कुछ संतरे खरीदे और जब वह उसके घर पहुंचा तो उसकी मां ने बताया की डॉक्टर ने उसके दोस्त को संतरे का रस पिलाने के लिए कहा है परंतु उनके पास इतने पैसे नहीं है जिनसे वह संतरे खरीद सके। राम ने तुरंत अपने संतरे दोस्त की मां को दे दिए। वह राम को खूब आशीर्वाद देने लगी। घर जाकर राम ने डिबिया खोली तो उसमें दो रुपए चमक रहे थे।

मनुष्य जैसे काम करता है, उसका स्वभाव वैसा ही हो जाता है। राम पहले रुपए के लोभ में अच्छे काम करता था परंतु धीरे – धीरे उसका स्वभाव अच्छे काम करने का हो गया। अच्छे काम करते – करते पुण्य के रुपयों से उसकी डिबिया भर गई। स्वर्ग को देखने की आशा से प्रसन्न होकर वह डिबिया लेकर अपने बगीचे में गया।

राम ने बगीचे में पेड़ के नीचे एक बूढ़े साधु को रोते हुए देखा। वह दौड़कर साधु के पास गया और उससे रोने का कारण पूछा। साधु बोला जैसी डिबिया तुम्हारे हाथ में है, वैसी डिबिया मेरे पास भी थी। बहुत परिश्रम करके मैंने उसे रुपयों से भरा था, किन्तु गंगा जी में स्नान करते समय पानी में गिर गई। इतना सुनते ही राम ने कहा आप दुःखी मत हों।

आप मेरी डिबिया ले लीजिए ये रुपयों से भरी हुई है। साधु ने कहा तुमने भी परिश्रम करके इसे भरा है, तुम्हें भी दुःख होगा। राम ने कहा मेरी उम्र तो अभी कम है, मैं और परिश्रम करके कमा लूंगा। आप बूढ़े हो गए हैं अतः आप मेरी डिबिया ले लीजिए।

साधु के भेष में आए देवता ने राम के नेत्रों पर हाथ फेर कर आंखें बंद कर दी। दिन में ही उसे स्वर्ग दिखाई पड़ने लगा। इतने सुन्दर स्वर्ग का वर्णन तो दादी ने कहानी सुनाते समय भी नहीं किया था। जब राम ने आंखें खोली तो स्वप्न में दिखाई देने वाले देवता उसके सामने खड़े थे। देवता ने कहा, “जो लोग अच्छे काम करते हैं, उनका घर स्वर्ग बन जाता है। जीवन में भलाई करते रहने से अंत में स्वर्ग में पहुंच जाते हैं।”

इस प्रकार बाल्यावस्था में हम बच्चों को जैसी शिक्षा देते हैं, और उनके सामने घर में रहने वाले सभी सदस्य एक – दूसरे के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, बोलते हैं। बच्चे भी वैसा ही व्यवहार करना व बोलना सीख जाते हैं।

बच्चों में हमें अच्छी आदतों का विकास करना चाहिए, उन्हें अच्छे संस्कार देने चाहिए जिससे वे अपने से बड़ों का आदर करना, अपने से छोटों को प्रेम करना, सहयोग करना सीखें और एक अच्छा इंसान बन सकें। इस प्रकार बचपन में बच्चे अपने बुजुर्गों से जो कहानियां सुनते हैं, उनका बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण पे बहुत गहरा असर पड़ता है।

Blog by:- Mrs. Sarita Pareek

Department of Education

Biyani Group of Colleges, Jaipur 

 

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