शिक्षकों के लिए क्रियात्मक अनुसंधान की आवश्यकता

शिक्षक एक सतत अधिगमकर्ता व शोधकर्ता है। शिक्षण के दौरान कक्षा कक्ष में शिक्षक को विभिन्न व्यवहारिक समस्याओ का सामना करना पडता है जैसे कक्षा कक्ष में छात्र अनुशासित नही हंै, शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में रूचि नहीं लेते, छात्र तथ्यों को रटने पर जोर देते हंै तथा चिंतन नहीं करते, छात्र पाठ्यक्रम सहगामी क्रिया में भाग नही लेते आदि। कक्षा कक्ष में इन चुनौतियों का सामना करने के लिए क्रियात्मक शोध आवश्यक है। क्रियात्मक शोध शैक्षिक समस्याओं के तत्कालिक समाधान की व्यवस्थित व वैज्ञानिक विधि है।

क्रियात्मक अनुसंधान का प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में सर्वप्रथम स्टीफन एम. कोरे ने 1953 में किया था। उनका मानना था कि जब तक शिक्षक स्वयं शोध कार्य मे संलग्न नही होंगे तब तक शिक्षा व विद्यालय को शोध से लाभ नही मिलेंगे।

विद्यालय में शिक्षक को अनेक समस्याओं का सामना करना पडता है परंतु इन समस्याओ के समाधान में मूलभूत शोध प्रभावी नही होते क्योंकि मूलभूत शोध में शोधकर्ता का विशेषज्ञ होना जरूरी है, न्यादर्श का आकार बहुत बडा होता है, समय अधिक लगता है तथा इनका उ६ेश्य परिणामांे का सामान्यीकरण करके सिद्वान्त व नियमों का निर्माण करना होता है इसके विपरित क्रियात्मक अनुसंधान में शोधकर्ता शिक्षक होता है जिसका न्यादर्श कक्षा तक सीमित होता है तथा उसका उ६ेश्य सिद्वान्तों का निर्माण न करके दैनिक शैक्षिक समस्याओं का समाधान करना होता है।

क्रियात्मक अनुसंधान की विशेषताएँ-

1) इसकी प्रकृति व्यवस्थित व व्यवहारिक होती है। यह ब्राह्म साहित्यिक स्त्रोतों पर निर्भर नहीं है।
2) यह शिक्षक के द्वारा शिक्षक के लिए किया जाता है।
3) इसके द्वारा अभ्यास मंे सुधार होता है।
4) यह परावर्तक चिंतन की विधि है। जिसके अन्तर्गत शिक्षक अपने शिक्षण पर चिंतन करता है।
5) यह लचीली प्रक्रिया है। शिक्षक अपने स्वयं की विधि का चुनाव करके क्रियात्मक अनुसंधान कर सकता है।
6) इस शोध के द्वारा परिणामों का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता।

क्रियात्मक अनुसंधान मे न्यादर्श के चयन के लिए सो६ेश्य विधि का चयन किया जाता है। न्यादर्श जनसंख्या का प्रतिनिधित्व नही करता। इसमें आंकडो के एकत्रीकरण हेतु निम्न उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।

क्रियात्मक अनुसंधान की प्रक्रिया चक्रिय है, जिसके अन्तर्गत शिक्षक सर्वप्रथम योजना बनाता है फिर उसको क्रियान्वित करता है तथा अवलोकन करके परावर्तन चितंन करता है व पुनः यह प्रक्रिया दोहरायी जाती है। क्रियात्मक अनुसंधान के द्वारा शिक्षक अपने कक्षा कक्ष अभ्यास के विषय में परावर्तन करता है तथा अपनी शिक्षण अनुभवांे में सुधार लाता है, पाठ्यक्रम, नवीन शिक्षण विधि व तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया की प्रभावशीलता का पता लगाता है व उनमें सुधार लाने का प्रयास करता है। इस दौरान शिक्षक में शोध कौशलों जैसे आंकडों का संग्रहण, तथा विश्लेषण आदि का भी विकास होता है।

सारांशतः यह कहा जा सकता है कि समय बदल गया है तथा समय के साथ शिक्षण अधिगम-परिस्थितियाँ व विधियाँ भी बदल गई हैं तथा क्रियात्मक अनुसंधान के द्वारा शिक्षक इन बदली हुई परिस्थितियों मे शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए स्वयं के अभ्यास में सुधार ला सकता है यही सुधार प्रक्रिया शिक्षक के व्यावसायिक विकास का आधार बनती है।

Blog By :- Dr. Arti Gupta

Department of Education

Biyani Group Of Colleges

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