वेद के तीन मुख्य विषय हैं ज्ञान, भक्ति और कर्म। इन तीनों विषयों में से ज्ञान पक्ष का प्रतिपादन उपनिषदों में हुआ है। उपनिषद भारतीय दर्शन, संस्कृति और शिक्षा-परंपरा के आधार स्तंभ माने जाते हैं। ये वैदिक साहित्य का दार्शनिक भाग हैं, जिनमें जीवन, आत्मा, ब्रह्म, ज्ञान और मोक्ष से संबंधित गहन विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
उपनिषदों ने भारतीय शिक्षा को केवल भौतिक या व्यावसायिक न बनाकर उसे आध्यात्मिक, नैतिक और मानवीय मूल्यों से समृद्ध किया है। भारतीय शिक्षा प्रणाली पर उपनिषदों का प्रभाव आज भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। उपनिषद वेदों के दार्शनिक चिंतन का सार प्रस्तुत करते हैं। उपनिषद वेदों में निहित ज्ञान को प्रकाश में लाते हैं।
भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है और इसी आधार पर शिक्षा का लक्ष्य भी मोक्ष प्राप्ति माना गया है, जिसे “सा विद्या या विमुक्तए” कहा गया है। उपनिषद शिक्षा के इस सर्वोच्च लक्ष्य की विवेचना करते हैं और यही दृष्टिकोण आज के शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों के लिए भी मार्गदर्शक है। इसी संदर्भ में यदि कोई विद्यार्थी उपनिषदों के आदर्शों पर आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षक शिक्षा की खोज में है, तो एक श्रेष्ठ बी.एड. महाविद्यालय के रूप में बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है, जहाँ आधुनिक शिक्षण विधियों के साथ भारतीय दर्शन और नैतिक मूल्यों का संतुलित समावेश किया जाता है।
उपनिषद की तत्त्व मीमांसा
उपनिषद की तत्त्व मीमांसा के अंतर्गत निम्नलिखित तत्व आते हैं-
- ब्रह्म
- जीवन और आत्मा
आत्मा परम तत्व है और जीवात्मा की चार अवस्थाएँ हैं–
- जागृत अवस्था – इस अवस्था में जीव इंद्रियों द्वारा सांसारिक विषयों का भोग करता है।
- स्वप्न अवस्था – इस अवस्था में आंतरिक संवेग वस्तुओं को जानता है।
- सुषुप्ति अवस्था – इस अवस्था में जीवात्मा प्रज्ञा कहलाता है।
- तुरीय अवस्था – इस अवस्था में जीवात्मा शुद्ध चैतन्य होता है।
जीव मूल रूप से आत्मा ही है। आत्मा नष्ट नहीं होती, जबकि शरीर विनाशी है। माया के कारण आत्मा एवं जीव में भेद प्रतीत होता है, परंतु आत्मा का वास्तविक स्वरूप ब्रह्म ही है।
- जगत
जगत सत्य है और यह ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है। ब्रह्म ही जगत की उत्पत्ति का कारण है। जगत ब्रह्म से उत्पन्न होता है, उसी से पलता है और अंततः उसी में विलीन हो जाता है।
- माया
माया ईश्वर की वह शक्ति है जिसके माध्यम से वह जगत की रचना करता है। काम, क्रोध, लोभ और मोह माया के अस्त्र-शस्त्र हैं। माया के जाल में फँसकर जीव ब्रह्म के दर्शन नहीं कर पाता।
उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म के दो रूप हैं – परब्रह्म और अपरब्रह्म। ब्रह्म अद्वैत, शून्य एवं कालातीत है। ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है।
उपनिषद व शिक्षा के उद्देश्य
वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल भौतिक उन्नति रह गया है, जिससे मानव जीवन असंतुलित, तनावग्रस्त और कुसमायोजन से ग्रसित हो गया है। उपनिषद दर्शन को शिक्षा में सम्मिलित करने से भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति में संतुलन स्थापित किया जा सकता है तथा बालक का सर्वांगीण विकास संभव है।
उपनिषद दर्शन के माध्यम से पंचकोषों—अन्नमयकोष, प्राणमयकोष, मनोमयकोष, विज्ञानमयकोष एवं आनंदमयकोष—का विकास कर स्वास्थ्य, बुद्धि, मानसिक एवं आध्यात्मिक पक्षों को सुदृढ़ किया जा सकता है।
उपनिषद व पाठ्यक्रम
वर्तमान पाठ्यक्रम में केवल अपराविद्या को स्थान दिया गया है, जिसमें भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, वाणिज्य, कला एवं साहित्य आदि विषय शामिल हैं। यदि इसके साथ उपनिषदों में वर्णित पराविद्या—ध्यान, आसन, प्राणायाम, तप और यज्ञ—को जोड़ा जाए, तो पाठ्यक्रम पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकता है।
उपनिषद व शिक्षण विधियाँ
उपनिषदों में स्वाध्याय, प्रवचन, विचार-विमर्श, प्रश्नोत्तर, तर्क, कथा, व्याख्यान एवं श्रवण विधियों का उल्लेख मिलता है। उपनिषदों की शिक्षण प्रक्रिया श्रवण, मनन और निदिध्यासन पर आधारित थी। आज भी इस क्रम को अपनाकर ज्ञान को आचरण में उतारा जा सकता है, क्योंकि व्यवहार में प्रयोग के बिना ज्ञान निरर्थक है।
उपनिषद व अनुशासन
उपनिषदीय शिक्षा व्यवस्था में आंतरिक एवं बाह्य अनुशासन पर विशेष बल दिया गया। आंतरिक अनुशासन में संयम एवं आत्मानुशासन तथा बाह्य अनुशासन में गुरु द्वारा शिष्य का मार्गदर्शन एवं आवश्यक दंड व्यवस्था थी। वर्तमान शिक्षा में इस संतुलन को अपनाया जा सकता है।
उपनिषद व विद्यालय
उपनिषदकाल में गुरु का आश्रम ही विद्यालय होता था। ये जीवन शिक्षा के केंद्र थे, जहाँ सांसारिक जीवन एवं मोक्ष की प्राप्ति की शिक्षा दी जाती थी। आज विद्यालय केवल औपचारिक शिक्षा केंद्र बनकर रह गए हैं। उपनिषद व्यवस्था को अपनाकर विद्यालयों को क्रियात्मक एवं जीवनोपयोगी शिक्षा के केंद्र बनाया जा सकता है।
भारतीय शिक्षा पर उपनिषदों का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में देखा जाता है। गुरु शिष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण में मार्गदर्शक की भूमिका निभाते थे। यह परंपरा आज भी भारतीय शिक्षा की आत्मा मानी जाती है।
निष्कर्षतः
उपनिषदों के दर्शन को अपनाकर भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाए जा सकते हैं और समाज को सही दिशा प्रदान की जा सकती है।
ब्लॉग लेखन:डॉ. आरती गुप्ता
प्राध्यापक, शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी.एड. महाविद्यालय,जयपुर
