कामकाजी महिलाएं और मानसिक स्वास्थ्य

आज की कामकाजी महिला (Working Woman) 21वीं सदी की पहचान बन चुकी है। वह आत्मनिर्भर है, शिक्षित है और समाज की प्रगति में सक्रिय भूमिका निभा रही है। अच्छे B.Ed कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करके महिलाएँ न केवल एक कुशल शिक्षिका बनती हैं, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और व्यावसायिक समझ भी विकसित होती है। वह घर और कार्यस्थल दोनों जगह अपनी जिम्मेदारियों को संतुलन के साथ निभाने का प्रयास करती है, लेकिन इस दोहरी भूमिका के बीच उनका मानसिक स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक संतुलन की स्थिति है। कामकाजी महिलाओं के लिए यह संतुलन बनाए रखना कई बार अत्यंत कठिन हो जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर दोहरी जिम्मेदारियों का दबाव

Working Women के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है—काम और परिवार के बीच संतुलन। ऑफिस की समय-सीमा, लक्ष्य, प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन का दबाव एक ओर, तो घर की जिम्मेदारियाँ, बच्चों की देखभाल, रिश्तों को निभाना और सामाजिक अपेक्षाएँ दूसरी ओर। समाज अक्सर महिला से यह अपेक्षा करता है कि वह सब कुछ बिना थके, बिना शिकायत के निभाए। यही सोच धीरे-धीरे उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

जब महिला स्वयं के लिए समय नहीं निकाल पाती, तब तनाव, चिड़चिड़ापन और भावनात्मक थकान जन्म लेती है।

कार्यस्थल की चुनौतियाँ और मानसिक स्वास्थ्य

कार्यस्थल पर भी कामकाजी महिलाओं को कई मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे—

  • लैंगिक भेदभाव
  • असमान वेतन
  • पदोन्नति में बाधाएँ
  • कार्यस्थल पर असुरक्षा या उपेक्षा

इन सबका सीधा असर महिला के आत्मविश्वास और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। कई महिलाएँ अपनी समस्याएँ खुलकर कह नहीं पातीं, क्योंकि उन्हें “कमज़ोर” समझे जाने का डर होता है। यह दबा हुआ तनाव आगे चलकर चिंता (Anxiety), अवसाद (Depression) और बर्नआउट का रूप ले सकता है।

‘सब कुछ संभाल लेने’ की सामाजिक अपेक्षा

समाज में आज भी यह धारणा गहरी है कि महिला सब कुछ सहजता से संभाल सकती है। कामकाजी महिला से अपेक्षा की जाती है कि वह ऑफिस में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करे और घर में भी किसी प्रकार की कमी न आने दे। इस निरंतर परफेक्शन की मांग महिला को भीतर से थका देती है।

जब वह थकान व्यक्त करती है, तो कई बार उसे यह सुनने को मिलता है—“तुमने खुद चुना है काम करना।” यह सोच महिला के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना: एक साहसिक कदम

हाल के वर्षों में एक सकारात्मक बदलाव यह है कि कामकाजी महिलाएँ अब अपने मानसिक स्वास्थ्य पर बात करने लगी हैं। वे यह स्वीकार कर रही हैं कि थकना, परेशान होना या मदद माँगना कमजोरी नहीं है। यह आत्मजागरूकता सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना महिलाओं को यह समझने में मदद करता है कि वे अकेली नहीं हैं और समाधान संभव है।

आत्मदेखभाल (Self-care) का महत्व

कामकाजी महिलाओं के लिए आत्मदेखभाल अत्यंत आवश्यक है। इसके अंतर्गत—

  • पर्याप्त नींद
  • स्वस्थ आहार
  • नियमित व्यायाम
  • अपने लिए समय निकालना
  • भावनाओं को साझा करना

ये छोटे-छोटे कदम मानसिक संतुलन बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब महिला स्वयं को प्राथमिकता देती है, तभी वह दूसरों की जिम्मेदारियाँ बेहतर ढंग से निभा पाती है।

परिवार और समाज की भूमिका

कामकाजी महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य केवल उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, कार्यस्थल और समाज को भी सहयोगी भूमिका निभानी होगी।

  • घर के कामों में साझेदारी
  • भावनात्मक सहयोग
  • कार्यस्थल पर संवेदनशील नीतियाँ
  • महिला-अनुकूल वातावरण

जब सहयोग मिलता है, तब महिला न केवल बेहतर काम करती है, बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहती है।

निष्कर्ष

कामकाजी महिलाएं और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध गहरा और संवेदनशील है। कामकाजी महिला केवल एक भूमिका नहीं निभा रही, बल्कि वह हर दिन स्वयं से संघर्ष कर रही है—अपेक्षाओं, जिम्मेदारियों और समय के बीच। यदि हम सच में महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो हमें उसके मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा।

एक मानसिक रूप से स्वस्थ कामकाजी महिला ही आत्मविश्वास से भरी, सृजनशील और सशक्त समाज की नींव रख सकती है। महिला को “सब सह लेने वाली” नहीं, बल्कि समझी जाने वाली इंसान मानना ही वास्तविक प्रगति की पहचान है।


ब्लॉग लेखन:
डॉ. मीनाक्षी शर्मा
एजुकेशन डिपार्टमेंट
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर

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