प्रयोजन शिक्षण विधि: करके सीखने की सशक्त पद्धति

परिचय

आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए जिन शिक्षण विधियों का विकास हुआ, उनमें प्रयोजन शिक्षण विधि का विशेष स्थान है। इसे अंग्रेज़ी में Project Method कहा जाता है। इस विधि के प्रवर्तक अमेरिकी शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी और उनके शिष्य डब्ल्यू.एच. किलपैट्रिक माने जाते हैं। इस पद्धति का मूल सिद्धांत है—“करके सीखना” (Learning by Doing)। विद्यार्थी किसी वास्तविक जीवन से जुड़े कार्य को स्वयं करके ज्ञान प्राप्त करता है।

आज के समय में एक अच्छा B.Ed कॉलेज वही माना जाता है, जहाँ ऐसी आधुनिक शिक्षण विधियों के माध्यम से भावी शिक्षकों का व्यावहारिक और सर्वांगीण विकास किया जाता है।

प्रयोजन शिक्षण विधि का अर्थ

प्रयोजन शिक्षण विधि वह शिक्षण प्रक्रिया है जिसमें विद्यार्थी किसी उद्देश्यपूर्ण कार्य या समस्या को चुनकर, योजनाबद्ध ढंग से उसे पूरा करता है और इस दौरान आवश्यक ज्ञान, कौशल तथा अनुभव प्राप्त करता है। इसमें शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है, जबकि विद्यार्थी सक्रिय कर्ता होता है। यह विधि बाल–केंद्रित, गतिविधि आधारित और जीवन से जुड़ी हुई है।

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प्रयोजन शिक्षण विधि की विशेषताएँ

  • बाल–केंद्रित पद्धति – इसमें विद्यार्थी की रुचि, आवश्यकता और क्षमता को महत्व दिया जाता है।
  • क्रियाशीलता पर बल – विद्यार्थी स्वयं कार्य करता है, इसलिए अधिगम स्थायी होता है।
  • वास्तविक जीवन से संबंध – परियोजनाएँ दैनिक जीवन की समस्याओं से जुड़ी होती हैं।
  • सामूहिकता की भावना – समूह में कार्य करने से सहयोग, नेतृत्व और उत्तरदायित्व विकसित होते हैं।
  • ज्ञान का समन्वय – विभिन्न विषयों का ज्ञान एक साथ उपयोग में आता है।
  • समस्या समाधान क्षमता – विद्यार्थी सोच-विचार कर समाधान खोजना सीखता है।

प्रयोजन शिक्षण विधि के चरण

  1. परिस्थिति का निर्माण – शिक्षक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करता है जिससे विद्यार्थी में जिज्ञासा जागे।
  2. प्रयोजन का चयन – विद्यार्थी रुचि के अनुसार परियोजना चुनते हैं, जैसे—बगीचा बनाना, पत्रिका तैयार करना।
  3. योजना निर्माण – कार्य को छोटे–छोटे चरणों में बाँटा जाता है।
  4. क्रियान्वयन – विद्यार्थी सामग्री एकत्र कर वास्तविक कार्य करते हैं।
  5. मूल्यांकन – अंत में परिणाम, अनुभव और कठिनाइयों पर चर्चा की जाती है।

प्रयोजन शिक्षण विधि के प्रकार

  • निर्माणात्मक प्रयोजन – किसी वस्तु का निर्माण, जैसे मॉडल, चार्ट, बगीचा।
  • आनंदात्मक प्रयोजन – नाटक, गीत, उत्सव आयोजन।
  • समस्यात्मक प्रयोजन – किसी समस्या का समाधान खोजना।
  • कौशलात्मक प्रयोजन – किसी विशेष कौशल का विकास, जैसे सिलाई, लेखन, कंप्यूटर कार्य।

कक्षा में प्रयोग का उदाहरण

मान लीजिए विषय है— “पर्यावरण संरक्षण”।

विद्यार्थियों को विद्यालय परिसर को हरा–भरा बनाने की परियोजना दी जाती है।

  • वे पौधों की जानकारी इकट्ठा करेंगे
  • मिट्टी और खाद का प्रबंध करेंगे
  • पौधे लगाएंगे
  • उनके विकास का रिकॉर्ड रखेंगे

इस प्रक्रिया में विज्ञान, गणित, भाषा और सामाजिक अध्ययन—सभी विषयों का ज्ञान स्वतः जुड़ जाएगा।

इस विधि के लाभ

  • ज्ञान स्थायी और व्यावहारिक बनता है
  • आत्मविश्वास बढ़ता है
  • रचनात्मकता का विकास
  • श्रम के प्रति सम्मान
  • सामाजिक गुणों का विकास
  • परीक्षा के भय में कमी

विद्यार्थी रटने की जगह समझकर सीखता है। वह स्वयं अनुभव करता है, इसलिए सीखना बोझ नहीं बल्कि आनंद बन जाता है।

प्रयोजन शिक्षण विधि की सीमाएँ

  • समय अधिक लगता है
  • पाठ्यक्रम पूरा करने में कठिनाई
  • बड़े संसाधनों की आवश्यकता
  • शिक्षक का कुशल होना जरूरी
  • कक्षा नियंत्रण कभी–कभी कठिन

यदि विद्यालय में संसाधन कम हों तो इस विधि को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

शिक्षक की भूमिका

इस पद्धति में शिक्षक का कार्य आदेश देना नहीं, बल्कि—

  • मार्गदर्शन करना
  • प्रेरित करना
  • आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना
  • मूल्यांकन करना
  • सहयोगी वातावरण बनाना

शिक्षक जितना कुशल होगा, परियोजना उतनी ही सफल होगी।

आधुनिक समय में प्रासंगिकता

नई शिक्षा नीति 2020 भी गतिविधि आधारित, अनुभवजन्य और कौशल केंद्रित शिक्षा पर बल देती है। डिजिटल युग में परियोजनाएँ ऑनलाइन सर्वे, प्रेजेंटेशन, ब्लॉग लेखन, मॉडल निर्माण के रूप में और प्रभावी हो गई हैं। यह विधि 21वीं सदी के कौशल—सृजनशीलता, संप्रेषण, सहयोग और चिंतन—को विकसित करती है।

निष्कर्ष

प्रयोजन शिक्षण विधि केवल एक शिक्षण तकनीक नहीं, बल्कि जीवन जीने की तैयारी है। यह विद्यार्थी को आत्मनिर्भर, कर्मठ और समाजोपयोगी बनाती है। यद्यपि इसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं, फिर भी सही योजना और शिक्षक की कुशलता से इसे अत्यंत प्रभावी बनाया जा सकता है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब विद्यार्थी ज्ञान को जीवन में उतारना सीख जाए—और यही इस विधि की सबसे बड़ी शक्ति है।


ब्लॉग लेखन:
डॉ. तृप्ति सैनी
सहायक आचार्य,एजुकेशन डिपार्टमेंट
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर