शिक्षा का हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। एक अशिक्षित व्यक्ति को नियम-कानूनों का समुचित ज्ञान नहीं होता, जिससे वह उनका सही उपयोग नहीं कर पाता। शिक्षा वह साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति न केवल नियमों को समझता है, बल्कि जीवन की विकट से विकट समस्याओं का समाधान भी कर सकता है।
हमारे संविधान में स्वतंत्रता, समानता, न्याय एवं बंधुत्व से संबंधित अनेक अनुच्छेद दिए गए हैं, जिनकी जानकारी व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। बिना शिक्षा के उसका ज्ञान अपूर्ण रहता है। संविधान की प्रस्तावना से नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, कार्य की स्वतंत्रता तथा समानता और न्याय का संदेश मिलता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि पाठशालाओं और उच्च शिक्षा संस्थानों ने इन संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने हेतु क्या प्रयास किए हैं और कौन-से परिवर्तन किए गए हैं, जिन पर मंथन किया जा सके।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को केंद्र एवं समवर्ती सूची में रखकर एक सुव्यवस्थित ढांचा तैयार किया, जिससे केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बना रहे। समय-समय पर विभिन्न आयोगों ने अपनी संस्तुतियाँ प्रस्तुत कीं ताकि शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके।
नि:शुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की मांग को गति देने में गोपाल कृष्ण गोखले का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे उस समय इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य थे। उन्होंने 19 मार्च 1910 को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। यद्यपि इसे पूर्ण रूप से लागू होने में लगभग 100 वर्ष लगे।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) से 22 तक नागरिकों को विभिन्न स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई हैं। इसी प्रकार कोठारी आयोग (1964-66) ने शिक्षा के क्षेत्र में असमानताओं को दूर करने और शैक्षिक अवसरों की समानता सुनिश्चित करने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिए। अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता के अधिकार को सुनिश्चित किया गया है।
संविधान की प्रस्तावना में निहित स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व की भावना को सशक्त करने हेतु भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वर्ष 1986 में शिक्षा मंत्रालय का पुनर्गठन कर केंद्रीय स्तर पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थापना की।
आधुनिक समय में शिक्षा मंत्रालय केंद्र सरकार का एक प्रमुख अंग है। इसकी देखरेख कैबिनेट स्तर का मंत्री करता है, जिसके अधीन शिक्षा संबंधी दायित्वों के निर्वहन हेतु राज्य मंत्री एवं उप मंत्री नियुक्त होते हैं।
नई शिक्षा नीति भी इसी दिशा में प्रेरित है, जिसका उद्देश्य शैक्षिक विषमताओं को दूर करना और अब तक वंचित वर्गों को समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना है। इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) एवं यूनेस्को का योगदान भी उल्लेखनीय है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अंतर्गत शिक्षा के माध्यम से प्राप्त होने वाले अधिकार निम्नलिखित हैं:
- नागरिक अधिकार: सभी व्यक्ति जन्म से स्वतंत्र हैं और उन्हें स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।
- राजनीतिक अधिकार: मानवाधिकारों के अंतर्गत धाराएँ 14, 15 एवं 21 राजनीतिक अधिकारों की पुष्टि करती हैं।
- आर्थिक अधिकार: धाराएँ 17, 22, 23, 24 एवं 25 आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करती हैं।
- सामाजिक अधिकार: समाज से संबंधित अधिकारों को मानवाधिकार घोषणा-पत्र में सम्मिलित किया गया है।
- सांस्कृतिक अधिकार: प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा एवं संरक्षण का अधिकार है।
इस वैश्विक आंदोलन का प्रभाव भारतीय संविधान पर भी पड़ा। इसी कारण संविधान के क्रियान्वयन के साथ ही वर्ष 1950 में भारत में सभी के लिए अनिवार्य शिक्षा की घोषणा की गई, ताकि व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मानवीय मूल्यों को आत्मसात कर सके।
ब्लॉग लेखन: डॉ. मुकेश कुमारी
सहायक आचार्य,शिक्षा विभाग
