आज का युग प्रतियोगिता का युग है। हर छात्र बेहतर अंक, अच्छे कॉलेज, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक स्वीकृति की दौड़ में शामिल है। पढ़ाई के साथ-साथ अपेक्षाओं का बोझ इतना बढ़ गया है कि छात्र का मानसिक स्वास्थ्य धीरे-धीरे प्रभावित हो रहा है। विशेषकर वे छात्र जो शिक्षक बनने का सपना देखते हैं और बी.एड. कॉलेज में प्रवेश की तैयारी कर रहे होते हैं, उन पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव देखा जाता है। दुर्भाग्य से, हमारे समाज में अब भी छात्रों की मानसिक समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता, जबकि यह विषय शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
मानसिक स्वास्थ्य क्या है?
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल मानसिक रोगों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की सोचने, समझने, निर्णय लेने और भावनाओं को संतुलित रखने की क्षमता से जुड़ा होता है। एक मानसिक रूप से स्वस्थ छात्र आत्मविश्वासी होता है, तनाव को संभाल सकता है और जीवन की चुनौतियों का सामना सकारात्मक दृष्टिकोण से करता है।

छात्रों में मानसिक तनाव के प्रमुख कारण
आज के समय में छात्रों के मानसिक तनाव के कई कारण हैं। सबसे पहला कारण है अत्यधिक शैक्षणिक दबाव। अच्छे अंक लाने, टॉप करने और दूसरों से बेहतर बनने की अपेक्षा छात्रों को मानसिक रूप से थका देती है।
दूसरा बड़ा कारण है माता-पिता और समाज की अपेक्षाएँ। कई बार माता-पिता अनजाने में अपने अधूरे सपनों का बोझ बच्चों पर डाल देते हैं। इंजीनियर, डॉक्टर या सरकारी अधिकारी बनने का दबाव छात्रों की रुचि और क्षमता को नज़रअंदाज़ कर देता है।
तीसरा कारण है प्रतियोगी परीक्षाएँ। आज लगभग हर क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा है। सीमित सीटें और लाखों उम्मीदवार छात्रों में भय, चिंता और असफलता का डर पैदा करते हैं।
इसके अलावा सोशल मीडिया भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। दूसरों की “परफेक्ट लाइफ” देखकर छात्र खुद को कमतर समझने लगते हैं, जिससे आत्मविश्वास में कमी आती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव
मानसिक तनाव का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई और व्यवहार पर पड़ता है। तनावग्रस्त छात्र एकाग्रता नहीं बना पाते, जिससे उनकी शैक्षणिक प्रदर्शन क्षमता कम हो जाती है। लगातार चिंता रहने से नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन और थकान जैसी परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं।
गंभीर मामलों में अवसाद, चिंता विकार, आत्मग्लानि और आत्महत्या जैसे खतरनाक विचार भी मन में आ सकते हैं। भारत जैसे देश में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज की सोच
हमारे समाज में आज भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कई भ्रांतियाँ हैं। मानसिक समस्या को कमजोरी समझा जाता है और छात्र अपनी परेशानी खुलकर बताने से डरते हैं। “सब ठीक हो जाएगा”, “यह तो उम्र का असर है” जैसे वाक्य समस्या को और गंभीर बना देते हैं।
शिक्षा प्रणाली में भी मानसिक स्वास्थ्य को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। परीक्षा परिणाम और रैंक को ही सफलता का पैमाना मान लिया गया है।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उपाय
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए सबसे पहले खुला संवाद आवश्यक है। माता-पिता और शिक्षक छात्रों से नियमित बातचीत करें और उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करें।
पढ़ाई के साथ संतुलन भी बहुत जरूरी है। खेल, संगीत, कला और अन्य रचनात्मक गतिविधियाँ मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होती हैं।
समय प्रबंधन छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण कौशल है। सही समय पर पढ़ाई, विश्राम और मनोरंजन से तनाव कम किया जा सकता है।
इसके अलावा योग, ध्यान और व्यायाम मानसिक शांति प्रदान करते हैं। रोज़ाना थोड़े समय का ध्यान भी सोचने की क्षमता और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
शिक्षण संस्थानों की भूमिका
स्कूल और कॉलेजों में परामर्श सेवाएँ उपलब्ध होनी चाहिए। प्रशिक्षित परामर्शदाता छात्रों की समस्याओं को समझकर सही मार्गदर्शन दे सकते हैं।
शिक्षा प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना समय की मांग है। छात्रों को यह सिखाया जाना चाहिए कि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य।
निष्कर्ष
छात्र किसी भी देश का भविष्य होते हैं। यदि उनका मानसिक स्वास्थ्य मजबूत नहीं होगा, तो वे अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाएँगे। आज आवश्यकता है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लें, छात्रों पर अनावश्यक दबाव न डालें और उन्हें समझने का प्रयास करें।
एक स्वस्थ मन ही स्वस्थ समाज की नींव रखता है। इसलिए छात्रों की मानसिक भलाई केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
ब्लॉग लेखन:डॉ. प्रियंका शर्मा
सहायक आचार्य,शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर
