अंधविश्वास और भारतीय सामाजिक जीवन

भारतीय समाज विविधताओं से भरा हुआ है—यहाँ की संस्कृति, परंपराएँ, मान्यताएँ और जीवन-शैली अत्यंत समृद्ध हैं। किंतु इस समृद्धि के साथ-साथ कुछ ऐसी मान्यताएँ भी समाज में गहराई तक जड़ें जमाए हुए हैं, जो वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित नहीं हैं, फिर भी पीढ़ी दर पीढ़ी प्रचलित रहती आई हैं। इन्हीं मान्यताओं को हम भ्रमात्मक विश्वास या अंधविश्वास कहते हैं। अंधविश्वास भारतीय सामाजिक जीवन पर एक गंभीर अभिशाप के रूप में उपस्थित है, जो व्यक्ति की सोच, व्यवहार और निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है।

अंधविश्वास का अर्थ उन विश्वासों से है जिनका कोई तर्कसंगत, वैज्ञानिक या प्रमाणित आधार नहीं होता, फिर भी लोग उन्हें सत्य मानकर अपनाते हैं। उदाहरण के रूप में—यात्रा पर निकलते समय किसी का छींक देना अपशकुन मानना, बिल्ली के रास्ता काटने को अशुभ समझना, ग्रहण के समय भोजन न करना, या किसी विशेष दिन बाल न कटवाना—ये सब ऐसी धारणाएँ हैं जो समाज में गहराई से समाई हुई हैं।

अंधविश्वास का सामाजिक आधार

यदि हम व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो अंधविश्वास प्रायः उन समुदायों और क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं जहाँ शिक्षा का स्तर निम्न होता है तथा जीवन-निर्वाह के साधन सीमित होते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक आपदाओं और संसाधनों की कमी वाले क्षेत्रों में लोग असुरक्षा की भावना से घिरे रहते हैं। जब मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं का समाधान तर्क और विज्ञान के माध्यम से नहीं खोज पाता, तब वह अलौकिक शक्तियों और भ्रमात्मक धारणाओं का सहारा लेने लगता है।

इस प्रकार अंधविश्वास केवल व्यक्तिगत सोच की कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थितियों का परिणाम भी है।

अंधविश्वास के प्रमुख कारण

  1. आकस्मिकता (Incidental Causes)

    मानव मस्तिष्क स्वभावतः घटनाओं के बीच संबंध स्थापित करने की प्रवृत्ति रखता है। यदि किसी व्यक्ति ने एक बार किसी विशेष परिस्थिति में कोई कार्य किया और संयोगवश उसे हानि हुई, तो वह यह मान बैठता है कि उस कार्य के कारण ही नुकसान हुआ। उदाहरण के लिए, यदि किसी ने घर से निकलते समय किसी को छींकते सुना और उस दिन उसका काम बिगड़ गया, तो वह आगे से छींक को अपशकुन मानने लगेगा।

    यह सोच संयोग और कारण के बीच अंतर न कर पाने की मानसिक भूल है। बार-बार दोहराई गई ऐसी धारणाएँ अंततः अंधविश्वास का रूप ले लेती हैं।

  2. अज्ञानता (Ignorance)

    अज्ञानता अंधविश्वास की सबसे बड़ी जड़ है। शिक्षा मनुष्य को तर्क करना, प्रश्न पूछना और प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेना सिखाती है। जिन समाजों में शिक्षा का अभाव होता है, वहाँ लोग प्राकृतिक घटनाओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक कारणों को नहीं समझ पाते।

    बिजली गिरना, ग्रहण लगना, बीमारी फैलना—इन सबको कभी देवताओं का कोप या भूत-प्रेत का प्रभाव माना जाता था। आज विज्ञान ने इनके कारण स्पष्ट कर दिए हैं, फिर भी जहाँ शिक्षा का प्रकाश नहीं पहुँचता, वहाँ अज्ञानता के कारण अंधविश्वास फलते-फूलते रहते हैं।

  3. निजी स्वार्थ (Vested Interests)

    समाज में कुछ लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अंधविश्वासों को बढ़ावा देते हैं। ढोंगी साधु, तांत्रिक या कथित चमत्कारी व्यक्तित्व लोगों की कमजोरियों और भय का लाभ उठाकर उन्हें भ्रम में रखते हैं। वे झूठे उपाय, ताबीज, झाड़-फूंक या विशेष अनुष्ठानों के नाम पर लोगों का आर्थिक और मानसिक शोषण करते हैं।

    ऐसे लोग जानते हैं कि भयभीत और अज्ञानी व्यक्ति आसानी से प्रभावित हो जाता है। इसलिए वे अंधविश्वास को जीवित रखते हैं ताकि उनका प्रभाव और लाभ बना रहे।

  4. भाग्यवादिता (Fatalism)

    भाग्यवादिता वह मानसिकता है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन की असफलताओं और कठिनाइयों का कारण अपने प्रयासों की कमी के बजाय भाग्य या अलौकिक शक्तियों को मानता है।

    जब लोग किसी कार्य में असफल होते हैं तो आत्मविश्लेषण करने के बजाय यह कहकर संतोष कर लेते हैं कि “भाग्य साथ नहीं था” या “कोई अशुभ संकेत था।” यह सोच व्यक्ति को कर्महीन बनाती है और उसे वास्तविक समस्याओं के समाधान से दूर कर देती है।

अंधविश्वास के दुष्परिणाम

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव
  • आर्थिक शोषण
  • मानसिक भय और तनाव
  • सामाजिक पिछड़ापन
  • स्वास्थ्य संबंधी खतरे

अंधविश्वास से मुक्ति के उपाय

  • शिक्षा का प्रसार
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास
  • जनजागरूकता अभियान
  • कानूनी नियंत्रण
  • परिवार की सकारात्मक भूमिका

निष्कर्ष

अंधविश्वास भारतीय सामाजिक जीवन की एक जटिल समस्या है, जिसकी जड़ें अज्ञानता, भय, संयोगजन्य अनुभवों, स्वार्थी तत्वों और भाग्यवादिता में निहित हैं। यह केवल धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक चुनौती भी है। यदि समाज को प्रगतिशील, वैज्ञानिक और आत्मनिर्भर बनाना है, तो अंधविश्वासों से ऊपर उठकर तर्क, ज्ञान और कर्मप्रधान दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। शिक्षा ही वह प्रकाश है जो भ्रमों के अंधकार को दूर कर सकती है और व्यक्ति को सच्चे अर्थों में स्वतंत्र सोच प्रदान कर सकती है।


ब्लॉग लेखन:डॉ. मुकेश कुमारी
सहायक प्राध्यापक, शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी.एड. महाविद्यालय,जयपुर

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