वर्तमान युग को यदि परिवर्तन और विरोधाभासों का युग कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक ओर विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं दूसरी ओर हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, सामाजिक असहिष्णुता, मानसिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और नैतिक पतन जैसी समस्याएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं। ऐसे जटिल वैश्विक और सामाजिक परिदृश्य में शांति शिक्षा (Peace Education) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो गई है। शांति शिक्षा केवल संघर्षों की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और विश्व में सकारात्मक, न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की स्थापना का माध्यम है।
आज समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और व्यक्तिगत स्वार्थ ने मानवीय संबंधों को कमजोर कर दिया है। परिवार, विद्यालय और समाज में सहनशीलता, सहयोग और संवाद का अभाव दिखाई देता है। शांति शिक्षा इन परिस्थितियों में मानव मूल्यों जैसे प्रेम, करुणा, सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और आपसी सम्मान को पुनः स्थापित करने का प्रयास करती है। यह शिक्षा व्यक्ति को यह सिखाती है कि मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान हिंसा या टकराव से नहीं, बल्कि संवाद और समझ से संभव है।
वर्तमान विश्व बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक स्वरूप धारण कर चुका है। वैश्वीकरण और आवागमन के कारण विभिन्न संस्कृतियाँ, भाषाएँ और विचार एक-दूसरे के निकट आ गए हैं। ऐसी स्थिति में सांस्कृतिक टकराव और पहचान-संकट की समस्याएँ उभरती हैं। शांति शिक्षा विविधता में एकता की भावना को प्रोत्साहित करती है और यह सिखाती है कि भिन्नता कमजोरी नहीं, बल्कि समाज की शक्ति है। यह शिक्षा नागरिकों को वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान करती है और विश्व-बंधुत्व की भावना को विकसित करती है।

आज के समय में युवा वर्ग अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रहा है। शैक्षणिक दबाव, बेरोजगारी, सामाजिक अपेक्षाएँ, डिजिटल लत और भविष्य की अनिश्चितता युवाओं को मानसिक रूप से असंतुलित कर रही हैं। शांति शिक्षा भावनात्मक साक्षरता, आत्म-नियंत्रण और आत्म-चिंतन की क्षमता को विकसित कर युवाओं को आंतरिक शांति की ओर प्रेरित करती है। जब व्यक्ति स्वयं शांत और संतुलित होता है, तभी वह समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
डिजिटल युग में सूचना का तीव्र प्रसार हुआ है, लेकिन इसके साथ ही घृणा, अफवाहें और नकारात्मक विचार भी तेजी से फैल रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से वैमनस्य और आक्रोश को बढ़ावा मिलता है, जिससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है। शांति शिक्षा आलोचनात्मक चिंतन और नैतिक विवेक का विकास करती है, जिससे व्यक्ति सही और गलत में अंतर कर सके तथा जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बन सके।
पर्यावरणीय संकट भी वर्तमान समय की एक गंभीर चुनौती है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके हैं। शांति शिक्षा मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित करने पर बल देती है। यह शिक्षा पर्यावरणीय चेतना और जिम्मेदारी की भावना को विकसित करती है, जिससे सतत विकास और प्राकृतिक शांति संभव हो सके।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते संघर्ष, युद्ध और शरणार्थी समस्याएँ यह स्पष्ट करती हैं कि केवल राजनीतिक या सैन्य समाधान स्थायी शांति नहीं ला सकते। शांति शिक्षा दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करती है, क्योंकि यह मनुष्य की सोच, दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन लाने पर केंद्रित होती है। यह शिक्षा लोकतांत्रिक मूल्यों, मानव अधिकारों और सामाजिक न्याय को मजबूत करती है, जो स्थायी शांति के अनिवार्य तत्व हैं।
शैक्षिक संस्थानों में शांति शिक्षा का समावेश विद्यार्थियों को केवल ज्ञानवान ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और नैतिक नागरिक बनाने में सहायक होता है। शिक्षक, पाठ्यक्रम और सह-पाठ्यचर्या गतिविधियों के माध्यम से शांति के मूल्यों को व्यवहार में उतारा जा सकता है। इससे विद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र न होकर शांति और सद्भाव की प्रयोगशाला बन जाते हैं।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वर्तमान संदर्भ में शांति शिक्षा कोई वैकल्पिक या गौण अवधारणा नहीं, बल्कि समय की अनिवार्य आवश्यकता है। यह शिक्षा व्यक्ति के आंतरिक विकास से लेकर वैश्विक शांति तक की यात्रा को संभव बनाती है। जब तक शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार तक सीमित रहेगा, तब तक समाज में असंतुलन बना रहेगा। शांति शिक्षा मानवता को सही दिशा देने का कार्य करती है और एक शांत, न्यायपूर्ण तथा समरस विश्व के निर्माण की आधारशिला रखती है।
ब्लॉग लेखन:
डॉ. विनीता शर्मा
सहायक आचार्य,एजुकेशन डिपार्टमेंट
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर
