बाल साहित्य बच्चों के संपूर्ण विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम होता है। यह बच्चों की मनोरंजन का एक साधन है क्योंकि यह बच्चों को बहुत प्रिय होता है। बाल साहित्य को बाल मनोभावों, कल्पनाओं एवं बालकों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है क्योंकि यह बालकों के मानसिक, नैतिक, भावात्मक और बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः बाल साहित्य का निर्माण छात्रों की प्रत्येक गतिविधि को ध्यान में रखकर किया जाता है। यह विषय विशेष रूप से अच्छे शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाल साहित्य की समझ प्रभावी शिक्षण का आधार बनती है।
बाल साहित्य विशेष रूप से बच्चों के लिए लिखा जाता है यह बच्चों की आयु, रुचि, क्षमता, समझ और मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए। बाल साहित्य में कहानी, प्रेरक-प्रसंग, कविताएं, परी-कथाएं, चित्र-कथाएं, लोक कथाएं, लघु-नाटक आदि शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य केवल बच्चों का मनोरंजन करना नहीं होता बल्कि बच्चों में नैतिक मूल्य, अच्छे संस्कारों, कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विकास करना भी होता है। यह साहित्य सरल, रोचक और शिक्षाप्रद होता है जिससे बच्चे सहज रूप से सीख सकें।
विद्वानों के अनुसार छोटे बालकों को उनके विद्यालयों में प्रारंभिक कक्षाओं से ही रोचक प्रसंगों एवं कहानियों को ध्यानपूर्वक सुना एवं याद करने की शिक्षा हिंदी शिक्षण के द्वारा देनी चाहिए। अतः विद्यालय में वाद-विवाद, भाषण, कविता पाठ, अंताक्षरी, बाल सभा, कवि सम्मेलन एवं अभिनय आदि कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए और बालकों को इनमें भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। शिक्षक को बालकों के साथ घर जैसा वातावरण प्रेम, सहानुभूति और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण बनाए रखना चाहिए जिससे बालक अध्यापक के निकट रहकर सामान्य विषयों पर भी विचार प्रकट कर सके।
लोक-कथाएं व कहानियां बालकों का मनोरंजन एवं मनोविनोद करती है, उन्हें शिक्षाप्रद उपदेश देती है, तर्कसंगत ढंग से विचार करना सिखाती है, उनकी कल्पना शक्ति को विकसित करती है और संवेगों को प्रशिक्षित करती है, पठन और लेखन कौशल में दक्षता प्रदान करती है। बाल साहित्य के स्वाध्याय से बालक शुद्ध उच्चारण करना, गति व प्रवाह के साथ पढ़ना सीखता है। बालक कहानी व कथाओं को पढ़कर इसका केंद्रीय भाव लिखना सीखता है। अनुच्छेद व वाक्य को उचित विराम चिन्हों का प्रयोग करते हुए शुद्ध एवं गति पूर्वक लिखना सीखता है। बालक पर्यटन स्थानों, मेलों आदि का क्रमबद्ध रूप से वर्णन लिखना तथा गद्य और पद्य के अंश को पढ़कर उसे संक्षेप में लिखना सीख जाता है।
बाल साहित्य की भाषा सरल, स्पष्ट और बच्चों के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए। इसमें कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए जिससे बच्चे उसे रुचि लेकर पढ़ सके और उन्हें आसानी से समझ में आ जाए। बाल साहित्य का मुख्य उद्देश्य बच्चों को आकर्षित करना होता है। इनमें रोचक घटनाएं और मनोरंजक प्रसंग होते हैं जो बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों को सच्चाई, ईमानदारी, साहस, मित्रता, सहयोग और नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती है। इसमें चित्रों का विशेष महत्व होता है। रंग-बिरंगे चित्र बच्चों को आकर्षित करते हैं। बाल साहित्य छोटा, स्पष्ट और प्रभावशाली होता है। इसकी प्रेरक कहानी बच्चों को जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों से परिचित करती है और अच्छी शिक्षा प्रदान करती है। बाल साहित्य को पढ़ने से बच्चों में एकाग्रता का विकास होता है और बालक चिंतन, मनन करना सीखते हैं।
बाल साहित्य से बच्चों का बौद्धिक विकास होता है, भाषा समृद्ध होती है, शब्द भंडार बढ़ता है, बच्चे अच्छे-बुरे में अंतर करना सीखते हैं, उनका भावनात्मक संतुलन मजबूत होता है। बाल साहित्य पढ़ने से बच्चों की रचनात्मकता बढ़ती है और सामाजिक गुणों का विकास होता है। प्रेरणादायक कहानियां बच्चों में आत्मविश्वास को बढ़ाती है और कठिनाइयों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है। बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों को समय का महत्व, स्वच्छता, अनुशासन और कठिन परिश्रम जैसे गुणों को सिखाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न-1-बाल साहित्य का क्या उद्देश्य है?
उत्तर-बच्चों का मनोरंजन करना और उनमें नैतिक मूल्य, अच्छे संस्कारों, कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विकास करना है।
प्रश्न -2-बाल साहित्य की भाषा कैसी होनी चाहिए?
उत्तर-बाल साहित्य की भाषा सरल सहज स्पष्ट और बच्चों के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।
प्रश्न -3-बाल साहित्य का स्वरूप कैसा हो? जिससे बच्चे उसकी तरफ आकर्षित हो सके।
उत्तर-बाल साहित्य में रंग-बिरंगे चित्र होने चाहिए और यह छोटा और प्रभावशाली होना चाहिए जिससे बच्चे आकर्षित हो सकें।
श्रीमती सरिता पारीक
सहायक आचार्या, शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी. एड कॉलेज, जयपुर
