भारत देश ‘अनेकता में एकता’ वाला देश माना जाता है। यहाँ की संस्कृति एवं भाषा में विविधता ही इसकी पहचान है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में वैश्वीकरण और आर्थिक बदलाव के कारण एक विदेशी भाषा, अंग्रेज़ी ने भारतीय समाज एवं शिक्षा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। आज अंग्रेज़ी भाषा केवल एक भाषा ही नहीं, बल्कि आधुनिकता, बौद्धिकता एवं सफलता का पैमाना बन चुकी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सन् 1835 में अंग्रेज़ी भाषा को भारतीय शिक्षण प्रणाली में मान्यता प्राप्त हुई। इसके जनक थॉमस मैकाले थे। उन्होंने ही अंग्रेज़ी शिक्षा की नींव रखी, जिसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेज़ी भाषा में दक्ष ‘लिपिक’ (clerk) तैयार करना था। इस प्रकार, शिक्षा गुरुकुल प्रणाली से निकलकर परीक्षा प्रणाली और औपचारिकता पर आधारित हो गई, जिससे समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा।
प्राचीन समय में ‘डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थ्योरी’ (छनाई का सिद्धांत) के माध्यम से शिक्षा को समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। इसका तात्पर्य था कि शिक्षा पहले समाज के उच्च वर्ग तक पहुँचा दी जाए, जिससे समाज के निचले स्तर के लोगों तक इसका प्रसार स्वयं ही हो जाएगा। इस प्रकार, अंग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत यूरोपियनों के आगमन से हुई, जिसका वर्चस्व वर्तमान समय तक बना हुआ है।
भारतीय शिक्षा जगत में अंग्रेज़ी भाषा का वर्चस्व
भारतीय शिक्षा प्रणाली में अंग्रेज़ी का महत्त्व प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:
- उच्च शिक्षा का माध्यम: चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और क़ानून जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की मुख्य भाषा अंग्रेज़ी है। अधिकांश संदर्भ पुस्तकें, शोध पत्र और वैश्विक डेटाबेस इसी भाषा में उपलब्ध हैं। यदि कोई विद्यार्थी विज्ञान, अनुसंधान या तकनीकी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है, तो अंग्रेज़ी भाषा उसके लिए अनिवार्य हो जाती है।
- डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट: वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप डिजिटल हो गया है। इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञान का अधिकांश भाग अंग्रेज़ी भाषा में ही है।
- प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाएँ: UPSC, बैंकिंग और CAT जैसी बड़ी प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंग्रेज़ी का एक विशेष खंड होता है, जिसके लिए इस भाषा का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।
भारतीय समाज पर प्रभाव
भारतीय समाज में अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव केवल कामकाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक व्यवस्था एवं प्रतिष्ठा का हिस्सा बन गया है।
- सामाजिक प्रतिष्ठा: भारतीय समाज में एक विडंबना यह है कि अंग्रेज़ी बोलने की क्षमता को अक्सर व्यक्ति की बुद्धिमत्ता से जोड़कर देखा जाता है। जो व्यक्ति धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलता है, उसे समाज में अधिक शिक्षित और सभ्य माना जाता है। इससे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषा बोलने वालों में कभी-कभी हीन भावना उत्पन्न होती है।
- संपर्क भाषा: पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक भारत में सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं। ऐसे में अंग्रेज़ी भाषा एक ‘पुल’ का काम करती है। एक तमिल भाषी और एक पंजाबी भाषी व्यक्ति के बीच संवाद का सबसे आसान माध्यम अक्सर अंग्रेज़ी ही होती है।
- रोज़गार की अनिवार्यता: निजी क्षेत्र की नौकरियों के लिए अंग्रेज़ी को एक अनिवार्य कौशल माना जाता है। BPO, IT और अन्य कॉर्पोरेट जगत में संवाद की मुख्य भाषा अंग्रेज़ी ही है। बेहतर वेतन और वैश्विक कंपनियों में काम करने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए यह भाषा सफलता की मुख्य सीढ़ी है।
- बदलती अर्थव्यवस्था: वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक बाज़ार से जुड़ी हुई है। आउटसोर्सिंग के क्षेत्र में भारत की सफलता का एक बड़ा कारण यहाँ के युवाओं की अंग्रेज़ी बोलने की क्षमता रही है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में अंग्रेज़ी भाषा का महत्त्व निर्विवाद है। यह वैश्विक ज्ञान और करियर के असीमित अवसरों के द्वार खोलती है। हालाँकि, हमें याद रखना चाहिए कि भाषा संवाद का माध्यम है, श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं। भारतीय समाज के लिए सही दृष्टिकोण यह होगा कि हम अंग्रेज़ी को एक सशक्त उपकरण के रूप में अपनाएँ, ताकि देश की शिक्षा और व्यापार जगत में निरंतर उन्नति होती रहे, परंतु अपनी मातृभाषा के गौरव को भी सुरक्षित रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:-
प्रश्न 1. वैश्वीकरण के पश्चात कौन सी भाषा विश्व पटल पर वैश्विक भाषा के रूप में जानी जाने लगी?
उत्तर: वैश्वीकरण के पश्चात अंग्रेज़ी भाषा विश्व पटल पर ‘वैश्विक भाषा’ के रूप में प्रचलित हुई।
प्रश्न 2. प्राचीन समय में किस माध्यम से शिक्षा को समाज के उच्च वर्ग तक पहुँचाया गया?
उत्तर: ब्रिटिश काल (प्राचीन संदर्भ में) में ‘डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थ्योरी’ के माध्यम से शिक्षा को समाज के उच्च वर्ग तक पहुँचाया गया।
प्रश्न 3. वर्तमान समय में अंग्रेज़ी भाषा कामकाज का हिस्सा मात्र न रहकर किसका हिस्सा बन गई है?
उत्तर: वर्तमान समय में अंग्रेज़ी भाषा केवल कामकाज का हिस्सा न रहकर ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ का प्रतीक बन गई है
ब्लॉग लेखन
पुष्पा कुमावत
सहायक आचार्या, शिक्षा विभाग
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर
