बच्चों की बढ़ती उम्र से अभिभावक की परेशानी व चिंता बनने लगती है, इसलिए वे उनका ज़रूरत सेज़्यादा ध्यान रखने लगते हैं। चौबीसों घंटे निगरानी रखने के चक्कर में कभी वे उनके कंप्यूटर, तो कभी अलमारी और तो कभी डायरी की तलाशी भी करने लगते हैं। दोस्तों के फोन कॉल भी सुनने की कोशिश करते हैं।
यह लेख बच्चों की बढ़ती उम्र में अभिभावकों की भूमिका को स्पष्ट करता है। यह विषय विशेष रूप से M.Ed कॉलेज में अध्ययनरत विद्यार्थियों, शिक्षक प्रशिक्षुओं तथा शिक्षा मनोविज्ञान का अध्ययन करने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
अभिभावक की इन बातों से बच्चों को भी परेशानी होती है। वे अभिभावकों के प्यार को नहीं समझ पाते। उन्हें लगता है कि उनके जीवन में हस्तक्षेप हो रहा है।

एक कहावत है —
“बच्चों में है जोश, अभिभावकों में है होश। दोनों में मेल नहीं, यही तो है अफ़सोस।”
बच्चों की बढ़ती उम्र में अभिभावक की ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है, इसलिए अभिभावक को चाहिए कि यदि बालक गलती करता है, तो उसे शांति से देखें व सुनें, तुरंत कोई प्रतिक्रिया न दें।
जैसे आपका बच्चा स्कूल से आया है और उसके अंक कम आए हैं, तो आते ही उस पर चिल्लाने के बजाय पहले उसे पानी पिलाएँ,
खाना खिलाएँ और फिर आराम से पूछें कि आखिर उसके इतने कम अंक क्यों आए। हो सकता है आपका यह सकारात्मक व्यवहार बच्चों को अपनी गलती का एहसास करा दे और वह हमेशा के लिए समझ जाए।
बच्चों की दूसरे भाइयों-बहनों या पड़ोस के बच्चों से तुलना न करें। हर बच्चा अलग होता है, इसलिए उसमें जो खूबियाँ हैं,
उनकी प्रशंसा करें।
अपनी कहानी, अनुभव और गलतियों को भी बच्चों के साथ साझा करना चाहिए। बच्चों के दोस्तों के अभिभावकों की जानकारी रखनी चाहिए।
यदि दोनों के अभिभावक आपस में बात करते हैं, तो बच्चों को स्वस्थ वातावरण मिलता है।
बच्चों की सुरक्षा के लिए अभिभावक को यह जानना ज़रूरी है कि बच्चा कहाँ जा रहा है और क्या कर रहा है।
यदि बच्चा लिखने का शौक़ीन हो, तो उसे अपनी बातें ई-मेल या लिखकर साझा करने के लिए कहना चाहिए। इससे सच का पता चल जाता है। गलती होने पर माफ़ी माँगना भी सिखाया जा सकता है।
चौबीस घंटे बच्चों के कंप्यूटर पर नज़र रखना माता-पिता के लिए सबसे मुश्किल है, इसलिए अश्लील वेबसाइटों को पहले ही ब्लॉक करना ज़रूरी है।
घर में कंप्यूटर ऐसी जगह रखें जहाँ हमेशा हलचल रहती हो, इससे बच्चों पर नज़र रखी जा सके। बच्चों को समझाएँ कि अपनी व्यक्तिगत जानकारी किसी से साझा न करें।
बच्चों पर विश्वास करना ज़रूरी है। अभिभावकों को चाहिए कि वे उनके कमरे में जाने से पहले दरवाज़ा खटखटाएँ। बच्चों के व्यवहार में आए बदलाव पर तुरंत उनसे बात करें।
स्थिति गंभीर होने पर मनोविशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से सलाह लें। चाहे समस्या कुछ भी हो — लगातार कॉलेज न जाना, अचानक नए दोस्त बनाना, ग्रेड गिरना या कोई और हरकत — अभिभावकों को बच्चों से व्यक्तिगत रूप से बात करनी चाहिए।
आपकी आवाज़ में आपका नियंत्रण ज़रूरी है। आदर से पेश आने की बात बड़ों के साथ ही नहीं, बच्चों पर भी लागू होती है। यदि आप उनसे ढंग से पेश आएँगे, तो वे भी दूसरों से वैसा ही व्यवहार करेंगे। अपने घर के लोगों से बच्चों के सामने झगड़ा न करें। इससे बच्चों पर ग़लत असर पड़ता है। आप बच्चों के लिए रोल मॉडल होते हैं, इसलिए आपके व्यवहार का बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
बच्चों की गलती पर ग़ुस्सा होना छोड़ दें। ग़ुस्सा आए भी तो वह आपके व्यवहार में नज़र नहीं आना चाहिए। उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा छूट न दें। अनुशासन में रहना सिखाएँ।
समय-समय पर उन्हें ज़िम्मेदारियाँ दें, इससे वे ज़िम्मेदार बनेंगे। बढ़ती उम्र के साथ आने वाले विभिन्न परिवर्तनों के विषय में उन्हें बताएँ, इससे बच्चे ग़लत रास्तों पर जाने से बचेंगे।
समय का बँटवारा करने से बेहतर है कि उन्हें इन विषयों में पहले से जानकारी दी जाए। उन पर विश्वास करें। समय-समय पर उनसे बात करते रहें, इससे संबंध सामान्य बने रहेंगे और एक-दूसरे को समझने में आसानी होगी।
कुछ बच्चों में प्रयोग करने और चुनौतियाँ लेने की आदत होती है, इसलिए अभिभावकों को पहले ही ड्रग्स, स्मोकिंग और अल्कोहल जैसे गंभीर विषयों पर खुलकर बात करनी चाहिए। इस प्रकार उक्त दायित्वों को निभाकर अपने बच्चों की बढ़ती उम्र को रचनात्मक दिशा में मोड़ा जा सकता है।
—ब्लॉग लेखन:
डॉ. सुनीता कुमारी शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
बियानी गर्ल्स बी.एड. कॉलेज, जयपुर
