टी.वी. एवं मोबाइल संस्कृति

टी.वी. और मोबाइल संस्कृति आधुनिक सभ्यता की देन  है l मनोरंजन के वर्तमान समय में यह उत्तम साधन है प्राचीन काल में भारत में अनेक मनोरंजन के साधन थे l जैसे रामलीला मंडली, नाटक मंडली, नौटंकी, मदारियों के खेल इत्यादि अनेक मनोरंजन के साधन हुआ करते थे यह सब साधन मानव के लिए ज्ञानवर्धक और सामाजिक संस्कृति को बढ़ावा देने वाले थे मनुष्य एक स्थान पर उपस्थित होकर सामूहिक रूप से इन आयोजनों में भाग लेता था और अपने विचारों का आदान-प्रदान भी करता था इससे लोगों को अपनी सांस्कृतिक परंपरा का ज्ञान होता था किंतु जब से टी.वी. और मोबाइल का प्रचार प्रसार बड़ा है तब से परंपरागत नाटक मंडली, रामलीला मंडली, रास मंडली, इत्यादि विलुप्त  हो गई है l

आज के युग में टेलीविजन एवं मोबाइल की उपयोगिता और  प्रभावोत्पादकता सर्वविदित है l  ज्ञान विज्ञान के प्रचार प्रसार में इसकी भूमिका सराहनीय है टेलीविजन एवं मोबाइल से प्रसारित मनोरंजन विज्ञापन दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं विज्ञान के इस आविष्कार ने संसार को हमारे निकट अवश्य ला दिया है l लेकिन पारिवारिक स्थितियों पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है आज परिवार के  सदस्यों मैं एक साथ इकट्ठा होकर किसी विषय पर चर्चा करने का समय नहीं है  टेलीविजन और मोबाइल की  सर्वक्षेत्रीय उपयोगिता के बारे में दो राय नहीं हो सकती, वहीं दूसरी ओर हमारे बच्चों, किशोरों और नवयुवकों पर पड़ रहे इसके दुष्परिणामों के बारे में भी आम सहमति है, नवयुवकों के मन पर उसकी पकड़ मजबूत होती जा रही है उसके प्रभाव से बच्चों में एक नई संस्कृति विकसित हो रही है जो अनेक दृष्टिकोण से भारतीय परिवेश के साथ मेल नहीं खाती बच्चों में टेलीविजन और मोबाइल की लत पैदा हो गई है उनकी इंद्रियां अवसादपूर्ण  रहती है l घर में बड़े बुजुर्ग यदि उन्हें रोकते हैं, तो वे उन्हें सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं बच्चे टेलीविजन एवं मोबाइल पर जो कुछ भी देखते हैं उसका प्रभाव अच्छा या बुरा अवश्य पड़ता है बच्चों में इतना विवेक नहीं होता कि वे अच्छे या बुरे का भेद कर सके उनमें इतना संयम भी नहीं होता की वे मात्र अच्छे को अपनाएं और बुरे को त्याग दें अधिक समय तक टेलीविजन एवं मोबाइल चलाने से बच्चे अंतर्मुखी हो जाते  है अतः बच्चों को टेलीविजन एवं मोबाइल चलाने से रोका जाना चाहिए और उनको संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए, संसाधनों का उपयोग उतना ही होना चाहिए जितनी उनकी जरूरत हो l इन पर निर्भर होना भी व्यक्ति के लिए हानिकारक है l

Blog By : Ms. Tripti Saini

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